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स्वस्थशरीर | औषधीय गुण | घरेलु चिकित्सा | जामुन

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जामुन दो प्रकार  होते हैं।  एक बड़ी जामुन , दूसरी  छोटी।  जामुन को  रायजामुन , थोरजामुन , जॉम्बी , कालाजाम आदि  नामों  से  विभिन्न  प्रांतों  में  जाना  जाता  है।  अंग्रेजी  में  इसे  जाम्बूल  कहा जाता है।  जामुन के  बीजों में  जम्बोलिन  नामक  ग्लूकोसाइड  पाया  जाता  है,  जो  स्टार्च  को  शर्करा  में  बदलने  से  रोकता  है ,  इसीलिए  यह  डायबिटीज  के  रोगी  के  लिए  हितकारी  है।  जामुन  के  पत्ते, फल  एवं  छाल  औषधीय  प्रयोजन  में  उपयोग  में  लए  जाते  हैं।  जामुन  के  पत्ते  आम  के  पत्ते  के  सामान  होते  हैं,  परन्तु  चिकने  और  चमकदार  होते  हैं।                      ...

स्वस्थशरीर | अौषधीय गुण | घरेलु चिकित्सा | गाजर

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             गाजर  को  सभी  खाते  हैं,  परन्तु  इसके आयुर्वेदिक  उपयोग  को  अधिकांश  लोग  नहीं  जानते।  गाजर  अम्लता  को  नष्ट  करता है , यकृत  रोगों  को  दूर करता  है।  गाजर  में  विद्यमान  विटामिन  कैंसर  से बचाता  है।       गाजर  का  रस  एंटीसेप्टिक  होता है ,  यह शरीर में  किसी भी  प्रकार  की  सडन  क्रिया  को  रोकता है।   गाजर  के रस  में  इन्सुलिन  तथा  अन्य  लाभदायक  हार्मोन  बना  देने  का  गुण  भी  होता है।  इसमें  म्युसिन  नामक  तत्व  आतंरिक  त्वचा  के लिए  मलहम  का काम  करता है।       गाजर में  पर्याप्त  मात्रा में  बीटाकेरोटीन , विटामिन -ए , बी , सी , डी , ई   तथा ...

स्वस्थशरीर | औषधिय गुण | घरेलु चिकित्सा | अखरोट

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        अखरोट  पतझड़  करने वाले  बहुत सुन्दर  और  सुगन्धित  बृक्ष  है , इसकी दो  जातियां  पाई  जाती है।  जंगली अखरोट   की पौधे १००  से  २००  फीट  तक  ऊँचे,  अपने  आप  उगने  वाले  तथा  फल  का  छिलका  मोटा  होता है।  कृषिजन्य  ४०  से  ९०  फीट  तक  ऊँचा  होता  है  और  इसके  फलों का  छिलका  पतला  होता  है।  इसे  कागजी  अखरोट  कहते  हैं।  इसके  बन्दूकों  के  कुन्दे  बनाये  जाते  हैं। बाह्यस्वरूप :                अखरोट की नई शाखाओं का पृष्ठ मखमली , कांड्त्वक धूसर तथा उसमें अनुलम्ब दिशा में दरारें होती हैं। पत्तियां पक्षवत सघन ,मूल रोमश , पत्रक संख्या में ५ से १३ , ३ से ८ इंच लम्बे ,२ से ४  इंच  चौड़े  अंडाकार ,  आयताकार  और ...

स्वस्थशरीर | औषधि गुण | घरेलु चिकित्सा | तुलसी

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तुलसी एक निरापद  एंटीबायोटिक  औषधि  है।  इसे  सर्व रोगहरी  कहा  जाता  है।  यह  औषधि  शारीरिक  एबं  मानसिक  रोगों का  शमन  करती  है।  आयुर्वेद  की  दॄष्टि  से  भी इसे  अनेक  रोगों में  प्रभावकारी  पाया  गया  है।  तुलसी का पौधा  भी  पीपल  की तरह  सतत  ऑक्सीजन  प्रदान कर मानव मात्र  के लिए  परम कल्याणकारी  है।  विकिरण  के  दुष्प्रभाव  को दूर  करने  का गुण  तुलसी में  है।  तुलसी  दो  प्रकार  है --एक  रामा  तुलसी , जिसके  पत्ते हरे  होते  हैं  तथा  दूसरी  श्यामा , जिसके  पत्ते  काले  होते  हैं।  आयुर्वेद  ने  दोनों  के गुण  सामान   बताएं  है।  तुलसी  को  वैष्णवी , बृंदा , तुलसा  विष्णुपत्नी , सुगंधा , पावनि  आदि  न...

स्वस्थशरीर | स्वस्थबृत्त का विज्ञानं | पंचकर्म

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स्वस्थबृत्त की जब हम चर्चा करते हैं तो दो नामों की विशेष चर्चा होती है --- पंचकर्म एवं षट्कर्म। आचार्य   चरक  कायचिकित्सा  को षट्कर्म  सिद्धि के रूप में  मानते  हैं।  उनके  अनुसार  ये  षट्कर्म  है ---१  लंघन ;  २ बृंहण ; ३  रक्षण ; ४  स्नेहन ; ५  स्वेदन  एबं ६  स्तंभन।   एक  है  शोधन , दूसरा  है  शमन।  शोधन  यदि   ठीक  से  हो तो  दोषों का  प्रकोप  नहीं होता।  पंचकर्म चिकित्सा   प्रधानतः  शशोधन  चिकित्सा  है।  दूसरी और   घेरंड संहिता भी हठयोग के अंतर्गत शरीर शोधन हेतु षट्कर्मों की बात कहती है। ये हैं धोती, नेति, नौलि, त्राटक  तथा कपाल भाति। छहों क्रियाएँ शरीर शोधन के लिए हैं। योगिराज घेरंड कहते हैं --''षट्कर्मों द्वारा शरीर का  शोधन कर आसनों से शरीर को दृढ़ करना चाहिए, मुद्राओं से उन्हें स्थिर कर प्राणायाम से स्पूर्ति एवं  लघुता  प्राप्त ...

स्वस्थशरीर | घरलू चिकित्सा | जोड़ों का दर्द

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शरीर में  अम्ल  तत्व  बढ़  जाने  से  'जोड़ों ' का दर्द  होता  है।  अम्ल  तत्व  के कारण  रक्त  दूषित  हो  जाता  है।  शरीर में वायु  का  प्रकोप बढ़  जाने  से  दूषित  पदार्थ  जोड़ों  में  रुकने  लगते  हैं , जिनसे  दर्द  होता  है   और  शरीर  में  अकड़न  आ  जाती  है।  रक्त  दूषित  होने  से  शरीर  का  विषाक्त  पदार्थ  पुरे  शरीर  में   संचारित  होता  है , जिससे  ज्वर  भी  रहने  लगता  है।  साथ  साथ  जोड़ों में  सूजन  आ  जाती  है।   धीरे  धीरे   यह  रोग  पुरे  शरीर के  जोड़ों में  फैल  जाता  है , जिससे  रोगि  का  चलना , बैठना  आदि  मुस्किल  हो जाता   है।  ...

स्वस्थशरीर | घरेलु चिकित्सा | प्रमेह रोग

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प्रमेह  शब्द  ' प्र' उपसर्गपूर्वक  'मिह ' धातु  लगाने  पर बनता  है।  इसका  ताप्तर्य  है अधिक  मात्रा में  बिकारयुक्त  मूत्र  का  निकलना।  बात , पित ,कफ  भेद  से  इसके  अनेक  भेद  मने  जाते हैं।  प्रमेह का  कारण  ----सुखपूर्वक  बैठे  रहने  या  सोनेसे  कफ की  बृद्धि  होती  है।  इसीलिए  कहा  जाता  है  की   ग्रीष्म  ऋतु  के  अतिरिक्त  अन्य  ऋतुओं  में  सोना  निषिद्ध  है ;क्योंकि  इससे  कफ की  बृद्धि  होती  है. शारीरिक  परिश्रम  करने से  कफ  घटता  है।  इसके  अलावा  स्वप्नसुख , दही  का  अत्यधिक  सेवन , दूध  एवं   नए  अन्न  का अधिक  सेवन , वर्षा  का  नया  जल , गुड ,चीनी , मिस्ररी ,विविध  प्रकार की मिठाइयां  तथा ...