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स्वस्थशरीर । आयुर्वेदिक औषधि । गिलोय

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गिलोय  अनेक  रोगोंसे  रक्षा  करनेवाली  जीवन  शक्ति को  बढ़ाने  वाली  निरापद  प्राकृतिक  एंटीबायोटिक  औषधि  है। गिलोय  टी.बी , कैंसर , टाइफाइड  एवं  सभी प्रकार के ज्वारों में  उपयोगी है। गिलोय  के  प्रचलित  नाम गुडुची , अमृता , गलो , गुडबेल , मधुपर्णी  आदि है। नीम  के पेड़ पर  चढ़ी  इसकी  लता  बेहद  लाभकारी  होता है।  इसकी लता  जिस पेड़ पर चढ़ती है , उस पेड़ की सारे  गुण  भी  अपने अंदर  समा  लेती है। यह  औषधि  कमजोरी  एवं  बृद्धावस्था  दूर  करती है। गिलोय  की लता  जो ऊँगली  जैसी  मोटी  तथा  धूसर  रंग  की  हो , वह औषधि  उपयोगी होता है।  इसकी लता  जितनी पुरानी हो उतनी ही  गुणकारी  होती है।  गिलोय की गुण एवं  धर्म -- बलकारक , रक्तशोधक , मूत्रल , पित्तनाशक , ज्वर  एवं  त्रिदोषनाशक  है। ...

स्वस्थशरीर । स्वस्थ्य रक्षा । उपवास

उपवास  का अर्थ  है  खली पेट  रहना।  पाचन तंत्र की  विराम  के लिए उपवास जरुरी  है। उपवास बिभिन्न  प्रकार की होती है।  जलउपवास, आंशिक  उपवास , फलोपवास , रसोपवास  आदि उपवास होती है। उपवास  से बिभिन्न  रोगोंको  जड़से  निकालकर  बहार किया  जा सकता है।  पुराने ज़माने मे  मुनि  ऋषिओं का  उम्र तथा  स्वस्थ्य  बहत अच्छा  था।  वे फल का आहार  करते थे तथा  उपवास रहने का आदत थी। ूोवास रहने का  उपकार निम्न  पंक्तिओं में  दिया गया है।  शरीर मे भोजन  को पाचन सतत  चलता रहता है।  उपवास कालमे  पाचन एवं उपचय की शक्ति  न्यून  हो जाती है।  उसकी साडी शक्ति  निर्माण  एवं बिषाक्त पदार्थों  को  निकलने में  लग जाती हे।  शरीर के रोगों  को दूर करने  वाली  शक्ति स्वयं  चलित  पद्धति , बनाने की पद्धति  तथा जाँच  करने की  शक्ति  सृष्टि  होती ह...

स्वस्थशरीर । नियम । स्वाथ्य रक्षा

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हमारे  जीवन  में एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए कुछ  नियमों को पालन करना  पड़ता है।  दैनिक  दिनचर्या  को ध्यान देना  बहत जरुरी है। ऐसी  कुछ  नियमों का यहाँ वर्णन कर रहा हूँ।  १। नित्य  सूर्योदय  से पूर्व  उठने का एक नियम  बना लें।  इसके लिए  रात्रि  में  जल्दी सोना  जरुरी  है। अनावश्यक  रूप से रात्रि में  अधिक  देर तक  जागें नहीं।  २। प्रतिदिन जितनी  सीमा में संभव हो , व्यायाम  अवश्य  करें।  प्रज्ञायोग  एक सरल  सी  व्यायाम - प्रक्रिया  है , जो नित्य  करने पर  सदैव  निरोग रखती है। टहलने और तैरने  से भी अच्छा  व्यायाम  होती है।  शरीर  को अच्छी तरह  तेल का मालिस  करने  से  चर्म  निरोग  रहने के साथ साथ  पूरा  शरीर  अच्छा  रहता  है। ३।  दैनिक सुबह - शाम  कमसे कम  आधा घंटा  टहलने का  अभ्यास  रखें...

स्वस्थशरीर । आयुर्वेदिक चिकित्सा । हिक्का और श्वास रोग

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हिक्का  और श्वास  रोग  पाण्डु  रोग के बाद  जन्म  लेते है ; ऐसा  हमारे  आयुर्वेद  के विद्वानों का  मत है।  पाण्डु रोग  चिकित्सा न होने पर  श्वास रोग  का  रूप ले  लेता  है।  हिक्का  रोग में  बार बार हिचकी  आता  है, इसीलिए इस रोग को हिक्का  कहते है। जिस रोग  से रोजमर्रा की  जीवन चर्या  में  कष्ट  हो एवं  वायु  मुश्किल से अंदर  बाहर  जा आ  पा  रही हो , उसे  श्वास  रोग कहा जाता  है। प्राणवायु  और  उदान  वायु  प्रकुपित होकर  जब  एक साथ  क्रियाशील  होते है , तब  श्वास  द्वारा  लिया  हुआ  वायु  बीच में  रूककर  मुख की और  बढ़ता  है  और सहसा  हिक  शब्द  की  उत्पत्ति  हो जाती है।           हिक्का  और  श्वास  में  समानता  यह है की ये दोनों ...

स्वस्थशरीर । घरेलु चिकित्सा । एसिडिटी

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ए सिडिटी  रोग को  एसिड डिस्पेप्सिआ , एसिड  गैस्ट्राइटिस  और हाइपर क्लोरोहाइड्रिया  के नाम  से  भी जाना  जाता  है। इस  रोग  का  इतिहास  बहत पुराना  है।  लगातार  बासी  व  तामसिक  भोजन  खाने  से शरीर  मे बहत ज्यादा  अम्ल  तथा  पित्त का  निर्माण  होता है।  इसी को  अम्ल पित्त  कहते है।  बदलती  ऋतुओं  से इस रोग का सीधा  सम्बन्ध  है।  शरद  ऋतु  और वर्षा  ऋतु में  यह रोग  ज्यादा  पैर  पसारता  है।  इस रोग में  रोगी के  आमाशय  में  अम्ल  और  पित्त  का  निर्माण  बहुत  ज्यादा  होने लगता  है। तब  गैस्ट्रिकम्यूकोसा  में  उत्तेजना  पैदा  होती  है , जिससे  हाइपर  एसिडिटी  का शरीर  में  निर्माण होता  है। कई  बार  रोग  की  अवस्था  में ...

स्वस्थशरीर । घरेलु चिकित्सा । कुष्ठ रोग

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कुष्ठ  रोग से  त्रिदोष  वात , पित्त  एवं  कफ  की प्रधानता  के आधार  पर  इनको  वर्गीकृत  किया  जाता है।                                    कुष्ठ रोग  की कारण वात  दोष की  अधिकता  होने पर  कपाल  कुष्ठ , कफदोष  की  अधिकता  से  मंडल कुष्ठ , पित्तदोष के भड़कने से उदुम्बर  कुष्ठ , तीनो  दोषों  के  प्रभाव से  ककणक  कुष्ठ, वात  पित्तादि  दोष से  ऋक्षजिह्व  कुष्ठ , कफपित्त  दोष से पुण्डरी  कुष्ठ , वात  कफ दोष की अधिकता  होने पर  सिध्म  कुष्ठ होता है।  इन्हे ही सात  महाकुष्ठ  कहते है।  दोषों की प्रधानता  से ग्यारह  क्षुद्र  कुष्ठ  इस प्रकार है -- वात  कफ  दोष की अधिकता होने पर  चमाक्ष्य  कुष्ठ , एक कुष्ठ , कृतिम  कुष्ठ , विपदिका , अलसक  कुष्ठ...

स्वस्थशरीर | अौषधीय गुण | पपीता

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पपीता का पौधा  प्रायतः  सबकी  घर में  देखने  को  मिलता  है।  पपीता  की उपज  साल में दो बार  होती है।  विटामिन ए , बी , सी , डी  से  युक्त  एक अच्छा  एंटीऑक्सीडेंट  होने के कारण  यह   अनेक  रोगों  से  बचाता  है।  पपीता  त्वचा  तथा बालों के लिए भी  बड़ा उपयोगी  होता है।  पेप्सिन नामक एंजाइम  भोजन के पचाने  के  कार्य  में  प्रभावी  होता है।  अपच , प्लेग , कब्ज , यकृत  अादि  रोगों में  अधिक  लाभकारी  होता  है।  पपीता  के पत्तों  का  रस  कैंसररोधी  होता है।  डेंगू  इत्यादि रोगों में  प्लेटलेट्स  घटने  पर  पपीता के पत्तों का रस  देने से  शीघ्र  प्लेटलेट्स  चमत्कारी  ढंग से  बढ़ने  लगते हैं।                            ...